राजस्थान के नागौर जिले में ठेकादर भाइयों ने अपने भांजे की शादी में 21 करोड़ 11 लाख रुपए का मायरा भरा है. बताया जा रहा है कि यह अब तक का सबसे बड़ा मायरा है और इस भव्य मायरा को लेकर सोशल मीडिया पर तहलका मच गया है. दरअसल राजस्थान में भात को मायरा भी कहा जाता है. भात भरने की परंपरा उत्तर भारत के कई राज्य में काफी प्रचलित है और यह भारतीय शादियों में निभाई जाने वाली खास रस्म भी है. आप सभी ने नरसी का भात की कहानी तो सुनी होगी, जिसमें भगवान कृष्ण ने भक्त नरसी के यहां भात भरा और पूरे परिवार व गांव की लाज बचाई थी. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर लड़की या लड़के के मामा ही भात क्यों भरता है, उसके परिवार के अन्य लोग जैसे मौसी, बुआ आदि भात क्यों नहीं भरते. आइए जानते हैं आखिर मामा ही भात क्यों भरता है…
क्या है भात परंपरा?भारतीय शादियों में कई परंपराएं और रीति रिवाज किए जाते हैं, उनमें से एक है भात. कई जगहों पर मायरा को भात भी कहा जाता है. यह परंपरा आज से नहीं बल्कि कई सदियों से निभाई जा रही है. इस परंपरा में भाई अपनी बहन के बच्चों के लिए यानी भांजा या भांजी की शादी के लिए भात लेकर जाता है. इस भात में रुपए-पैसे, गहने, कपड़े, गाड़ी आदि चीजें होती है. जरूरी नहीं कि ये सारी चीजें भात में हों, लोग अपनी हैसियत के अनुसार भी भात भरते हैं. यानी जिसके पास जितना धन होता है, वह उतना ही मायरा या भात भरता है.
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अब यहां सवाल उठता है कि आखिर भात की रस्म कब से और किसने शुरू की. लड़के या लड़की के मामा ही भात क्यों भरते हैं, परिवार के अन्य सदस्य जैसे मौसी या बुआ, यह रस्म क्यों नहीं पूरा करते. जब इसके बारे में रिसर्च की तब दो कहानियां निकल कर आती हैं, एक ऐतिहासिक है और मिथकिय.
नरसी के भात की कहानीपहली कहानी की 15वीं शताब्दी की, जो नरसी के भात की है. यह कथा प्रचलीत है, जिसमें भगवान कृष्ण भात भरते हैं. भगवान कृष्ण का एक भक्त था, जिसमें नरसी था. नरसी की बेटी का नाम सुलचना बाई था, जिसका विवाह वह पहले की कर चुके थे. नरसी की बेटी की बेटी यानी नातिन की शादी थी. नरसी का कोई लड़का नहीं था इसलिए शादी से पहले नरसी खुद लड़की के घर गए. नरसी के लड़की के ससुराल वालों ने भात के लिए लंबी चौड़ी लिस्ट दे दी. नरसी खुद इतने गरीब थे कि रोज मांगकर खाते थे, ऐसे में वह शादी का भात कैसे भरते. नरसीजी परेशान और भात भरने की तारिख भी पास आने लगी. तब नरसी ने भगवान कृष्ण को याद किया. भगवान तो भक्त के लिए बैठे रहते हैं और नरसी के कहने पर वह भागे भागे आए कृष्णजी आ गए और भक्त नरसी की बेटी की बेटी का भात भर दिया. भक्त नरसी के भात की कथा बेहद प्रचलित है और इस भात पर तो कई लोकगती भी बन चुके हैं. कहा जाता है कि तब से ही भात देने की रस्म शुरू हुई.
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राणा सांगा के भात की कहानीदूसरी घटना राणा सांगा की मिलती है. राणा सांगा महाराणा प्रताप के दादा संग्राम सिंह या राणा सांगा है. कहानी के अनुसार, एक दिन राणा सांगा शिकार पर निकले थे और इसमें पूरा दिन लग गया और दिन ढल गया. शाम को राणा सांगा को भूख लग आई और पास एक कुटिया देखकर वहां रास्ता पूछा. कुटिया में रहने वाली औरत ने राणा सांगा को खाना खिलाया. राणा सांगा ने महिला से पूछा कि आखिर इतनी उदास क्यों हो. तब महिला ने कहा कि मेरे कोई पिता नहीं है और सारे भाइयों की मौत भी हो गई है. अब उनकी बेटी का भात कौन भरेगा. राणा सांगा ने कहा कि इसकी चिंता तुम मत करो. तब राणा सांगा ने भाई बनकर उसकी बेटी का भात भरा.
मामा ही क्यों भरते हैं भात?अब सवाल आता है मामा ही क्यों भात भरते हैं अन्य कोई सदस्य इस रस्म को क्यों नहीं पूरा कर सकता है. दरअसल माता के मायका पक्ष में मातृत्व के भाव होता है और वह जड़ माना जाता है. मामा की तरफ से भात में जो चावल लाए जाते हैं, उसमें भगवान विष्णु का वास माना जाता है और यह चावल वंश वृद्धि के प्रतीक भी होते हैं. साथ ही मामा दो मां शब्द से मिलकर बना है. बहन और भाई का प्रेम सर्वोपरि होता है और बहन के बच्चे मामा के लिए पूज्य समान होते हैं. मामा अपनी बहन के बच्चों को उपहार स्वरूप जो भी वस्तु देते हैं, वह उन बच्चों के जीवन में आने वाली बाधाओं से वह आशीर्वाद स्वरूप उपहार उनकी रक्षा करता है. इसलिए भात या मायरा मामा द्वारा ही दिया जाता है.
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चंद्रमा होता है मजबूतमामा का भांजे या भांजी को कोई भी उपहार देना बहुत शुभ शगुन माना जाता है. प्राचीन परंपरा से ही मां से ज्यादा स्नेह बच्चों को मामा करते हैं. जो बात बच्चे अपनी मां या पिता से नहीं कह पाते वह आसानी से मामा से कह देते हैं और मामा भी अपने भांजे या भांजी की समस्याओं को दूर कर देते हैं. भारतीय परंपाओं में आपने देखा होगा कि बच्चे गर्मियों की छुट्टियों में अपने मामा या नाना के घर जाने की जिद्द करते हैं. वह ऐसा इसलिए करते हैं कि क्योंकि वहां बच्चों को ज्यादा प्रेम, स्नेह और सम्मान मिलता है. मामा के घर से और मामा के द्वारा दिए गए अन्न या कोई अन्य चीज लेने से ज्योतिषीय मत के अनुसार चंद्रमा ग्रह की स्थिति कुंडली में मजबूत होती है. चंद्रमा मन और माता के कारक ग्रह हैं और कुंडली में जब चंद्रमा की स्थिति मजबूत होगी तो मन शांत रहेगा.
बुध ग्रह से मामा का संबंधविशेषकर जिन बच्चों के जीवन में चंद्रमा अगर कमजोर हो तो वह मामा के द्वारा दी गई कोई भी चांदी की धातु को अपने पास रखते हैं तो वह उससे चंद्रमा अधिक प्रसन्न होते हैं इसलिए चंद्रमा का चंदा मामा कहा जाता है. वहीं मामा का संबंध बुध ग्रह से भी होता है. मामा से अगर संबंध अच्छे होते हैं तो कुंडली में बुध ग्रह की स्थिति मजबूत होती है और बुध ग्रह बुद्धि, वाणी, तर्क, नौकरी व कारोबार के कारक ग्रह माने जाते हैं. जब बुध की स्थिति अच्छी रहती है तो व्यक्ति अपने लक्ष्य को लेकर स्पष्ट रहता है और जीवन में तरक्की में प्राप्त करता है.