मूंग फसल पर संकट. गर्मी के इस मौसम में जब किसान मूंग की फसल से मुनाफा कमाने का सपना देख रहे थे, तब फसल पर पीले मोजेक वायरस और कीटों का ऐसा हमला हुआ कि उनकी मेहनत पर पानी फिरता नजर आ रहा है. खंडवा जिले के किसान इस वक्त एक बड़ी कृषि समस्या से जूझ रहे हैं, जिसका असर सीधे तौर पर उनके उत्पादन और आमदनी पर पड़ रहा है.
जिले में इस साल लगभग 800 से 1000 हेक्टेयर क्षेत्र में मूंग की बोवनी की गई थी. शुरुआत में फसल की बढ़वार अच्छी रही, लेकिन पिछले कुछ हफ्तों में मौसम का मिजाज बदलते ही खेतों में संकट गहराने लगा। बार-बार बादल छाए रहने और नमी बढ़ने से मूंग की फसल पर पीले मोजेक और इल्लियों का जबरदस्त असर हुआ है.
फसल हो रही बर्बाद, किसानों की मेहनत पर पानीगांव सारोला के किसान मुकेश महाजन बताते हैं कि उनके खेतों में मूंग की फसल अब अंतिम चरण में है. फसल में फल्लियां लग चुकी हैं, लेकिन अचानक पत्तियों के साथ-साथ फल्लियां भी पीली होकर सूखने लगी हैं. वे कहते हैं, “जिस फसल से उम्मीद थी कि घर चलाएंगे, उसी को अब देखकर दिल बैठ जाता है. फल्लियों में दाना नहीं बन पा रहा है, और ऊपर से कीड़ों का हमला अलग.”
इसी तरह किसान सुरेंद्र आसखड़के का कहना है कि पिछले साल मौसम साफ रहने से उत्पादन बेहतर था. “एक एकड़ में 8 क्विंटल तक मूंग निकली थी, लेकिन इस बार मुश्किल से 3 से 4 क्विंटल की उम्मीद है,” वे बताते हैं.
वैज्ञानिक भी नहीं दे पाए समाधानअहमदपुर खेगा के किसान भागीरथ पटेल ने बताया कि इस बार बीमारी इतनी व्यापक है कि किसानों ने कृषि वैज्ञानिकों से भी संपर्क किया, लेकिन अब तक इस पर कोई सटीक हल नहीं मिला है. उन्होंने बताया “कई लोग कह रहे हैं कि यह मच्छरों या मौसम की वजह से फैलने वाला वायरस है, लेकिन असल में यह कैसे फैल रहा है, ये किसी को समझ नहीं आ रहा,”.
रासायनिक दवाओं और घरेलू उपायों से भी फर्क नहीं पड़ा. किसान कहते हैं कि उन्होंने कीटनाशकों का छिड़काव भी किया, लेकिन पीले मोजेक और इल्लियों का प्रकोप कम होने की बजाय लगातार बढ़ता जा रहा है.
भारी नुकसान का अंदेशामूंग की फसल सामान्य परिस्थितियों में प्रति एकड़ 7 से 10 क्विंटल तक उत्पादन देती है, लेकिन इस बार कीट और वायरस के कारण यह उत्पादन घटकर 2 से 4 क्विंटल के बीच सिमट सकता है. इससे प्रति एकड़ किसानों को करीब 40 से 50 हजार रुपये का सीधा नुकसान हो सकता है.
भागीरथ पटेल कहते हैं, “हमने खाद, बीज, दवा, मजदूरी – सब पर पैसा लगाया है. अब अगर फसल नहीं निकली तो ना कर्ज चुकाएंगे, ना घर का खर्च चलेगा.”
कृषि विभाग और प्रशासन से राहत की उम्मीदकिसानों का कहना है कि अब उनकी नजर सरकार और कृषि विभाग पर है. वे चाहते हैं कि नुकसान का सर्वे कराया जाए और उन्हें मुआवजा दिया जाए. साथ ही, आने वाले समय में इस तरह की बीमारियों से बचाव के लिए जागरूकता अभियान चलाया जाए.
एक सवाल: अगली बार फिर मूंग बोएंगे?इस पर किसान सुरेंद्र आसखड़के कहते हैं, “देखिए, खेती तो करनी ही है, लेकिन अब मूंग से डर लगने लगा है. अगर यही हाल रहा, तो किसान मूंग की बजाय दूसरी फसल की ओर रुख कर सकते हैं.”
खंडवा का यह उदाहरण न सिर्फ स्थानीय प्रशासन के लिए चेतावनी है, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए यह एक संकेत है कि जलवायु परिवर्तन और कीट-रोगों के बढ़ते खतरे को गंभीरता से लेना होगा. वरना, मेहनत करने वाला किसान और भी ज्यादा संकट में फंसता चला जाएगा.