विधायक उमेश पटेल की रणनीति के आगे झुका प्रशासन — अडानी की जनसुनवाई निरस्त, जनांदोलन बना जनता की जीत का प्रतीक, पढ़िए पूरी खबर

रायगढ मुनादी।। धर्मजयगढ़ विधानसभा के पुरुंगा में प्रस्तावित अंबुजा सीमेंट प्रोजेक्ट की 11 नवंबर को होने वाली जनसुनवाई आखिरकार निरस्त कर दी गई। प्रशासन की ओर से शनिवार को इस संबंध में आधिकारिक आदेश जारी किया गया। इस फैसले ने न केवल स्थानीय ग्रामीणों की जीत सुनिश्चित की बल्कि कांग्रेस विधायक उमेश पटेल के राजनीतिक चातुर्य और रणनीतिक कौशल को भी उजागर किया, जिन्होंने इस पूरे विरोध को एक जनांदोलन का रूप देकर प्रशासन को झुकने पर मजबूर कर दिया।उमेश पटेल की सूझबूझ से पलटी बाज़ीपिछले सप्ताह 6 नवंबर को जब खदान प्रभावित पुरुंगा और आसपास के सैकड़ों ग्रामीण रायगढ़ कलेक्ट्रेट के सामने प्रदर्शन करने पहुंचे थे, तब जिला प्रशासन के अड़ियल रवैए से मामला टकराव की स्थिति में पहुँच गया। आंदोलन लंबे खिंचने लगा था, लेकिन तभी खरसिया विधायक उमेश पटेल ने आगे बढ़कर स्थिति को अपने नियंत्रण में लिया।उन्होंने धर्मजयगढ़ विधायक लालजीत राठिया, लैलूंगा विधायक विद्यावती राठिया और कांग्रेस के अन्य स्थानीय नेताओं से गहन चर्चा की। फिर एक सुनियोजित रणनीति बनाकर प्रशासन पर दबाव बनाने का खाका तैयार किया। उसी रात सैकड़ों ग्रामीणों ने रायगढ़ कलेक्ट्रेट के सामने सड़क पर डेरा डाल दिया और पूरी रात वहीं धरना जारी रखा।ग्रामसभा की अनदेखी पर अड़ा रहा जनसमूहग्रामीणों की मांग स्पष्ट थी — “पेसा एक्ट” के तहत बिना ग्रामसभा की सहमति किसी भी औद्योगिक परियोजना को मंजूरी नहीं दी जा सकती। ग्रामीणों का कहना था कि उनकी राय लिए बिना सीमेंट फैक्ट्री की जनसुनवाई आयोजित करना संविधान के मूल भाव का उल्लंघन है।उमेश पटेल ने इस भावनात्मक मुद्दे को राजनीतिक धार दी और जनसुनवाई को “जनविरोधी” बताते हुए इसे जनआंदोलन का स्वरूप दे दिया। खरसिया और धर्मजयगढ़ दोनों विधानसभा क्षेत्रों के कार्यकर्ताओं ने इस आंदोलन में एकजुटता दिखाई।बैठक से बनी जीत की राहकलेक्ट्रेट परिसर में धरना के बाद ग्रामीणों की एक अहम बैठक आयोजित हुई, जिसमें उमेश पटेल खुद पहुंचे। बैठक में जनसुनवाई रोकने की रणनीति पर विस्तार से चर्चा हुई। यह तय हुआ कि आंदोलन शांतिपूर्ण लेकिन निर्णायक होगा।इस क्रमबद्ध दबाव और एकता का असर इतना व्यापक हुआ कि प्रशासन को अंततः 10 नवंबर को जनसुनवाई निरस्त करने की घोषणा करनी पड़ी।राजनीतिक चातुर्य का लोहा मनवायाइस पूरे घटनाक्रम में उमेश पटेल ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वे केवल संगठन के नेता ही नहीं बल्कि रणनीतिक राजनीतिक दिमाग भी रखते हैं। उन्होंने यह दिखा दिया कि यदि जनता के मुद्दे को सही दिशा और नेतृत्व मिले तो प्रशासनिक व्यवस्था को भी झुकाया जा सकता है।ग्रामीणों के हक में यह जीत केवल आंदोलन की सफलता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सशक्त अभिव्यक्ति भी है।ग्रामीणों की जीत, उमेश की रणनीतिजनसुनवाई निरस्त होने के बाद अब क्षेत्र में जश्न का माहौल है। ग्रामीणों का कहना है कि “हमारे हक की लड़ाई में विधायक उमेश पटेल ने हमें न सिर्फ दिशा दी बल्कि हमें एकजुट रखा। यह जीत हम सबकी है।”वहीं राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि उमेश पटेल ने इस आंदोलन के ज़रिए यह भी जता दिया कि जब बात जनता के हक और पर्यावरण के संरक्षण की हो, तो वे किसी भी औद्योगिक दबाव के आगे झुकने वाले नहीं हैं।

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