Last Updated:May 12, 2025, 17:44 ISTछत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में स्थित मां मंरेलगढ़ीन का मंदिर एक प्राचीन शक्ति पीठ है, जहां पहले दाह के भीतर पूजा होती थी. श्रद्धालु यहां मन्नतें मांगते हैं और मां की कृपा से इच्छाएं पूर्ण होने की मान्यता है.X
मां मंरेलगढीन मंदिर शक्तिपीठ हाइलाइट्समां मंरेलगढ़ीन का मंदिर छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में स्थित है.नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ रूपों की विशेष पूजा होती है.देशभर से श्रद्धालु मां मंरेलगढ़ीन के दर्शन करने आते हैं.सरगुजा- छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के सीतापुर क्षेत्र में स्थित मां मंरेलगढ़ीन का मंदिर न सिर्फ धार्मिक श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि एक ऐतिहासिक धरोहर भी है. यह स्थल मांड नदी और पहाड़ियों के बीच बसा हुआ है, जिसे स्थानीय लोग मंगरेलगढ़ के नाम से जानते हैं. यहां की मान्यता है कि मां मंरेलगढ़ीन की पूजा पहले एक गुफानुमा दाह के भीतर हुआ करती थी.
राजा-महाराजाओं के समय से चली आ रही है यह परंपराऐसा कहा जाता है कि इस स्थान पर पहले भैंसे की बलि दी जाती थी और शक्ति धर्मी पूजा होती थी. उस समय कोई मंदिर नहीं था. पूजा दाह के भीतर ही होती थी. किंवदंती के अनुसार एक दिन बैंगा (स्थानीय पुजारी) जब पूजा कर रहा था, तभी मां मंरेलगढ़ीन नाराज हो गईं और उन्होंने तलवार फेंकी, जो जाकर वर्तमान मंदिर स्थल पर गिरी. इसके बाद से वहां भव्य मंदिर का निर्माण किया गया.
नवरात्रि में होती है मां के नौ रूपों की पूजाइस मंदिर में नवरात्रि के अवसर पर मां दुर्गा के नौ रूपों की विशेष पूजा की जाती है. यहां आने वाले श्रद्धालु मानते हैं कि मां मंरेलगढ़ीन उनकी हर मुराद पूरी करती हैं. इसलिए भक्तजन यहां बकरे की बलि, मिठाई और अन्य प्रसाद चढ़ाकर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं.
देशभर से श्रद्धालु करते हैं दर्शनयह शक्ति पीठ सिर्फ सरगुजा तक सीमित नहीं है, बल्कि बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के जसपुर जैसे इलाकों से भी लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं. कोई संतान प्राप्ति की कामना लेकर आता है, तो कोई नौकरी या अन्य इच्छाओं के साथ. मां की कृपा से हर श्रद्धालु को संतोष मिलता है.
दाह से मंदिर तक का ऐतिहासिक सफरमंदिर का यह इतिहास आज भी लोगों को रोमांचित करता है. जिस स्थान पर कभी गुफानुमा दाह में पूजा होती थी, आज वहां भव्य मंदिर, हनुमान मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों का निर्माण हो चुका है. लेकिन मां मंरेलगढ़ीन की आस्था और चमत्कार आज भी उसी रूप में जीवित हैं.
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