Potato Farming: आलू की उन्नत किस्म ‘कुफरी लवकर’ की खेती में किसानों को मिलेगा जबरदस्त लाभ, 30 टन से अधिक उपज की संभावना



Last Updated:May 03, 2025, 23:25 ISTPotato Farming: उत्तर भारत में जहां आलू का उपयोग मसालेदार तरी में होता है, वहीं दक्षिण भारत में यह मसाला डोसा और करी का हिस्सा बनता है. यह कुफरी लवकर किस्म चिप्स, नमकीन, फ्रेंच फ्राइज जैसी खाद्य सामग्री में भी …और पढ़ेंX

आलू की उन्नत किस्म कुफरी लवकर की खेतीरामकुमार नायक, रायपुर – भारतीय रसोई की शान और हर थाली की जान माने जाने वाले आलू की खेती में अब आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक विधियों का समावेश छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए नई उम्मीद लेकर आया है. खासकर ‘कुफरी लवकर’ किस्म के आलू की बुवाई व प्रबंधन से संबंधित जानकारी ने आलू उत्पादकों के लिए खेती को और भी लाभकारी बना दिया है.

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर द्वारा प्रदर्शित जानकारी के अनुसार, ‘कुफरी लवकर’ किस्म की खेती किसानों को मालामाल कर सकती है. इसकी खेती के लिए बीज दर 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रखी गई है, जिसमें 40-50 ग्राम आकार के आलू को प्राथमिकता दी जाती है. बीजोपचार के लिए 2.5 ग्राम/किग्रा कॉम्बिनेजिम उपयोगी बताया गया है. वहीं पंक्ति विन्यास में 90 x 30 सेमी का त्रिभुजाकार प्रारूप अपनाने की सलाह दी गई है, जिससे पौधों को समुचित स्थान मिलता है और फसल का विकास संतुलित होता है.

उर्वरकों की बात करें तो 20-25 टन गोबर खाद के साथ 150 किग्रा नत्रजन, 80 किग्रा फास्फोरस और 60 किग्रा पोटाश प्रति हेक्टेयर देना फसल के लिए उत्तम है. साथ ही ड्रिप सिंचाई की तकनीक अपनाकर हर दो दिन में 30 मिनट तक (एनपीके 19:19:19, 12:61:00, 13:0:45) की मात्रा में पोषण देना बताया गया है. खरपतवार नियंत्रण के लिए एक बार बुवाई के 20 दिन बाद और फिर 35 दिन बाद हेंड वीडिंग करनी चाहिए. अनुमानित उपज 30-35 टन प्रति हेक्टेयर तक बताई गई है, जो परंपरागत तरीकों से काफी अधिक है. कीटनाशक व रोगनाशक जैसे इमिडाक्लोप्रिड, मेटालैक्सिल, रिडोमिल तथा कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का उपयोग वैज्ञानिक मात्रा में करके फसल को कीटों और बीमारियों से सुरक्षित रखा जा सकता है.

भारत में आलू सिर्फ एक सब्ज़ी नहीं, बल्कि हर वर्ग की थाली का हिस्सा है. सुबह के नाश्ते में पराठा हो या दोपहर की सब्जी, शाम के पकौड़े हों या स्नैक्स, आलू हर रूप में पसंद किया जाता है. उत्तर भारत में जहां आलू का उपयोग मसालेदार तरी में होता है, वहीं दक्षिण भारत में यह मसाला डोसा और करी का हिस्सा बनता है. यह कुफरी लवकर किस्म चिप्स, नमकीन, फ्रेंच फ्राइज जैसी खाद्य सामग्री में भी बड़ा योगदान है. यही कारण है कि इसकी मांग हर मौसम और हर क्षेत्र में बनी रहती है. ऐसे में अगर किसान वैज्ञानिक विधियों को अपनाकर ‘कुफरी लवकर’ जैसी उच्च उपज देने वाली किस्मों की खेती करें, तो उनकी आमदनी बढ़नी तय है.
Location :Raipur,Chhattisgarhhomeagricultureगजब किस्म का है ये आलू, एक बार की खेती में 30 टन तक होगा पैदावार



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