देश की रक्षा के लिए नहीं की थी जान की परवाह, 1971 युद्ध के हीरो रहे रिटायर्ड कर्नल कक्कड़ ने साझा किया किस्सा



Last Updated:May 07, 2025, 10:29 ISTकर्नल शमशेर सिंह कक्कड़ मार्च 1971 में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे और उसी साल दिसंबर में उन्हें युद्ध का सामना करना पड़ा. महज छह महीने की ट्रेनिंग के बाद युद्ध में जाना एक असाधारण अनुभव था. उस वक्त उनकी उम्र म…और पढ़ेंX

रिटायर्ड कर्नल शमशेर सिंहहाइलाइट्सकर्नल कक्कड़ ने 1971 युद्ध में बहादुरी से पहाड़ी पर कब्जा किया.कक्कड़ पोस्ट आज भी उनकी वीरता की गवाही देती है.कर्नल कक्कड़ का परिवार सेना से जुड़ा रहा है.रायपुर. देश में जब भी युद्ध की आशंका बनती है, तब सबसे पहले हमारी आंखों के सामने उन वीर जवानों की तस्वीरें उभरती हैं, जिन्होंने इतिहास के युद्धों में अद्भुत साहस और पराक्रम का प्रदर्शन किया. ऐसे ही एक वीर योद्धा हैं रिटायर्ड कर्नल शमशेर सिंह कक्कड़, जिन्होंने 1971 के भारत-पाक युद्ध में अपनी बहादुरी से एक पहाड़ी को दुश्मन के कब्जे से छुड़ाया था. यह पहाड़ी आज भी “कक्कड़ पोस्ट” के नाम से जानी जाती है. कर्नल कक्कड़ ने Local18 से विशेष बातचीत में बताया कि वे मार्च 1971 में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे और उसी साल दिसंबर में उन्हें युद्ध का सामना करना पड़ा.

महज छह महीने की ट्रेनिंग के बाद युद्ध में जाना एक असाधारण अनुभव था. उस वक्त उनकी उम्र मात्र 23-24 वर्ष थी. उन्होंने बताया कि हर सैनिक चाहता है कि उसे देश के लिए लड़ने का मौका मिले, लेकिन ऐसा मौका हर किसी को नहीं मिलता. मुझे गर्व है कि मुझे इतने जल्दी यह अवसर मिला.

सेना से जुड़ा रहा है कर्नल कक्कड़ का परिवार

उन्होंने बताया कि उनका परिवार सेना से जुड़ा रहा है. उनके दादा हवलदार थे और उनके पिता मेजर के पद पर थे. उन्होंने बताया कि जब मैं युद्ध में गया, तो मुझे 1965 के युद्ध की याद आई, जब लोग रेडियो से चिपक कर सेना की खबरें सुना करते थे. एक भावना थी कि देश की जनता हमारी ओर देख रही है और जीत की उम्मीद कर रही है. उसी भावना से शक्ति मिलती है और जान की परवाह किए बिना हम आगे बढ़ते हैं. युद्ध के खतरों पर बात करते हुए वे कहते हैं कि हमें पता होता है कि अगर हम अटैक कर रहे हैं तो कुछ लोग शहीद होंगे, कुछ घायल होंगे और कुछ अपाहिज होकर लौटेंगे. लेकिन, देश की रक्षा के लिए यह सब सहना पड़ता है. युद्ध एक गंदा खेल है एक हारेगा, एक जीतेगा लेकिन हमें सिर्फ अपने देश की जीत की चिंता रहती है.

घायल होने की सूचना मिलने पर रोने लगी थी मां-बहनें

जब युद्ध में उन्हें चोट लगी और घर टेलीग्राम पहुंचा, तब उनकी मां और बहनें रोने लगीं, लेकिन पिता ने गर्व के साथ कहा कि देश के लिए लड़ा है, बहुत अच्छा किया. उन्होंने यह भी बताया कि युद्ध में सिर्फ सैनिक ही नहीं, धोबी, कारपेंटर जैसे सहायक कर्मचारी भी साथ रहते हैं. भले ही उनके पास हथियार न हों, लेकिन उनका योगदान भी अमूल्य होता है. कर्नल कक्कड़ की बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जब देश फिर से सीमाओं पर तनाव का सामना कर रहा है. उनका अनुभव आज की पीढ़ी को यह सिखाता है कि देशभक्ति सिर्फ शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म और बलिदान में होती है. जब भी युद्ध की स्थिति बने, हमें उन वीरों के त्याग और पराक्रम को याद रखना चाहिए, जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के देश के लिए अपने जीवन को दांव पर लगाया.
Location :Raipur,Chhattisgarhhomechhattisgarh1971 युद्ध के हीरो रहे थे रिटायर्ड कर्नल कक्कड़, उन्हीं के नाम पर है यह पोस्ट



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