Parashuram Story: भगवान विष्णु के दशावतारों में परशुराम अवतार सबसे रहस्यमय और जिज्ञासा का विषय रहा है. ऐसा माना जाता है कि परशुराम आज भी जीवित हैं. श्री हरि विष्णु ने शुक्र ग्रह की आंशिक ऊर्जा से परशुराम के रूप में माता रेणुका की कोख से जन्म लिया था. हालांकि उनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ, लेकिन उनका स्वभाव और कर्म क्षत्रिय सदृश थे, जिसका कारण उनके जन्म के समय घटी एक विशेष घटना थी. इस बारे में बता रहे हैं भोपाल स्थित ज्योतिषाचार्य रवि पाराशर.
शास्त्रों में परशुराम जी के जीवन से जुड़ी अनेक कथाएं वर्णित हैं, लेकिन एक विशिष्ट घटना उनके चरित्र को अत्यंत स्पष्ट रूप से दर्शाती है. एक बार, स्नान के उपरांत आश्रम लौटते समय माता रेणुका ने एक गंधर्व को नौका विहार करते देखा और क्षणिक रूप से आकर्षित हो गईं. यद्यपि उन्होंने स्वयं को शीघ्र ही संभाल लिया और आश्रम लौट आईं, परंतु ऋषि जमदग्नि ने अपनी दिव्य दृष्टि से यह सब देख लिया था.
उन्होंने पत्नी रेणुका के चरित्र पर संदेह व्यक्त करते हुए अपने पुत्रों को आदेश दिया कि वे माता का वध करें. परशुराम के बड़े भाइयों ने इस आज्ञा को मानने से इनकार कर दिया, जिससे क्रोधित होकर ऋषि जमदग्नि ने उन्हें बौद्धिक अपंगता का श्राप दे दिया. परंतु परशुराम ने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए, समर्पण भाव से माता का सिर धड़ से अलग कर दिया.
इस समर्पण से प्रसन्न होकर ऋषि जमदग्नि ने परशुराम को तीन वर मांगने को कहा.
पहले वर में परशुराम ने अपनी माता को पुनर्जीवित करने की मांग की, जिसे ऋषि ने संजीवनी विद्या द्वारा पूर्ण किया.
दूसरे वर में भाइयों को पूर्ववत स्वस्थ करने की बात कही, जो स्वीकार कर ली गई.
तीसरे वर में उन्होंने श्रेष्ठ शास्त्रज्ञान और दीर्घायु का वर मांगा, ताकि वे समाज की रक्षा कर सकें.
परशुराम की अपने परिवार के प्रति श्रद्धा, करुणा और समर्पण को देखकर ऋषि जमदग्नि अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें सभी वर प्रदान किए. ऐसा माना जाता है कि परशुराम तब से आज तक जीवित हैं और शास्त्रज्ञान का प्रसार करते आ रहे हैं. उनके प्रमुख शिष्यों में भीष्म पितामह, कर्ण और द्रोणाचार्य शामिल हैं.
एक अन्य प्रसिद्ध घटना के अनुसार, जब क्षत्रिय राजा सहस्त्रार्जुन ने ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दी, तब परशुराम ने प्रतिशोध स्वरूप पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से विहीन किया और एक संतुलित समाज की स्थापना की.
इस अवतार का ज्योतिषीय दृष्टिकोणपरशुराम द्वारा माता की आज्ञा से हत्या करना और फिर उन्हें पुनर्जीवित कर देना इस बात को दर्शाता है कि शुक्र ग्रह से प्रभावित जातक अत्यधिक समर्पणशील, श्रद्धालु, प्रेममय और कठिन निर्णय लेने की क्षमता रखने वाले होते हैं. उन्होंने अपने पिता के सम्मान की रक्षा के लिए कठोर निर्णय लिया और उसे पूर्ण किया, जो बताता है कि ऐसे जातकों में समाज और परिवार के प्रति गहरी जिम्मेदारी का भाव होता है.
ज्योतिष में कालपुरुष की कुंडली के अनुसार शुक्र की दोनों राशियों और उससे संबंधित भावों को मारक भाव कहा गया है. शुक्र को मारकेश भी माना जाता है. परंतु अगर गहराई से विचार करें तो स्पष्ट होता है कि “मारकता” का अर्थ केवल मृत्यु से नहीं है, बल्कि जीवन से जुड़ी विषम स्थितियों और संबंधों में सुधार लाकर नए जीवन की ओर बढ़ने की शक्ति भी शुक्र देता है. ये निर्णय कठिन होते हैं, परंतु शुक्र प्रभावित जातक उन्हें लेने का साहस रखते हैं.