सनातन धर्म में कई देवी और देवता हैं, जिनकी आराधना करने से व्यक्ति को अपने शुत्रओं पर विजय की प्राप्ति होती है. मां पार्वती के रौद्र रूप में महाकाली का वर्णन मिलता है, जो असुरों के सर्वनाश के लिए विकराल और भयानक स्वरूप धारण करती हैं. वहीं भगवान शिव जब क्रोधित होते हैं तो उनके रुद्रावतार वीरभद्र, काल भैरव तांडव मचाते हैं. सती के आत्मदाह पर वीरभद्र प्रजापति दक्ष का सिर काट देते हैं तो भगवान शिव का अपमान करने पर काल भैरव ब्रह्मा जी का सिर काटते हैं. सिंह पर सवार होने वाली मां दुर्गा भी असुरों का सर्वनाश कर देती हैं. आइए जानते हैं कि हिंदू धर्म में युद्ध के देवी और देवता कौन हैं? उनके आगे दुश्मनों की कोई बिसात नहीं, उनसे तो काल भी डरता है.
युद्ध की देवी हैं मां कात्यायनीमां दुर्गा के कात्यायनी स्वरूप को युद्ध की देवी कहा जाता है. मां दुर्गा के छठे स्वरूप के रूप में मां कात्यायनी की पूजा करते हैं. असुरों के राजा महिषासुर का जब अत्याचार ऋषि-मुनियों, देवी-देवताओं, मनुष्यों पर बढ़ गया, तब कात्यायन ऋषि की पुत्री के रूप में मां दुर्गा प्रकट हुईं. कात्यायन ऋषि के नाम से ही इस देवी को नाम मां कात्यायनी पड़ा.
मां दुर्गा की फोटो.
मां कात्यायनी की चार भुजाएं हैं और उनका वाहन सिंह है. मां कात्यायनी अपनी भुजा में तलवार और सफेद कमल पुष्प धारण करती हैं. भीषण युद्ध में मां कात्यायनी ने महिषासुर का वध करके भय और अधर्म का नाश किया था. महिषासुर ने ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया था कि उसे केवल महिला ही हरा सकती है. वह महिला को कमजोर समझता था. जो भी व्यक्ति देवी कात्यायनी की पूजा करता है, उसे शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है, यश और कीर्ति बढ़ती है.
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एक कथा यह भी है कि जब महिषासुर का अत्याचार बढ़ गया तो देवी और देवताओं ने आदिशक्ति मां जगदम्बा का आह्वान किया. तब वो मां दुर्गा के रूप में प्रकट हुईं, सभी देवी और देवताओं ने उनको अपने शस्त्र दिए. फिर सिंह पर सवार मां दुर्गा का महिषासुर से भीषण युद्ध हुआ, जिसमें महिषासुर मारा गया. वह जिस महिला को दुर्बल समझता था, उसी महिला के हाथों उसका अंत हुआ.
युद्ध के देवता हैं भगवान कार्तिकेयभगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र भगवान कार्तिकेय देवताओं के सेनापति हैं. उनका जन्म दैत्यों के राजा तारकासुर का वध करने के लिए हुआ था. उसने ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया था कि तीनों लोकों में उसके समान कोई दूसरा न हो और उसका वध केवल शिव जी के पुत्र के हाथों हो. जब देवी सती ने आत्मदाह कर लिया था, तो भगवान शिव समाधि में लीन हो गए थे. तब तारकासुर को लगा कि शिव समाधि में हैं और वे वैरागी हैं तो उनका विवाह संभव नहीं है, तो फिर पुत्र का सवाल ही नहीं उठता है.
युद्ध के देवता भगवान कार्तिकेय.
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वरदान पाकर तारकासुर अत्याचारी हो गया. वह सभी जीवों पर अत्याचार करने लगा. उसने स्वर्ग पर भी अधिकार कर लिया. देवी और देवताओं ने कामदेव और रति को शिव जी की समाधि तोड़ने का जिम्मा सौंपा. कामदेव ने शिवजी की समाधि तोड़ दी, लेकिन वे शिव जी के क्रोध का शिकार हो गए और महादेव ने उनको भस्म कर दिया. हालांकि बाद में माता पार्वती का विवाह शिव जी से हुआ. उनसे कार्तिकेय की उत्पत्ति हुई. ब्रह्मा जी के वारदान के अनुसार ही शिव पुत्र कार्तिकेय के हाथों तारकासुर का वध हुआ.