Arjuna Saves Pandavas Mahabharat story । महाभारत अर्जुन ने कैसे बचाई पांडवों की जान



Arjun Save Pandav life: महाभारत केवल एक युद्ध नहीं था, यह इंसान के स्वभाव, उसकी सोच, और धर्म-अधर्म के बीच की लड़ाई का आईना था. इस महायुद्ध में कई कहानियां छुपी हैं, जिनमें से एक है अर्जुन और दुर्योधन की. आम तौर पर ये दोनों एक-दूसरे के दुश्मन माने जाते हैं, लेकिन एक मौका ऐसा भी आया जब अर्जुन ने दुर्योधन से कुछ ऐसा मांग लिया जिससे पूरे पांडवों की जान बच गई. आश्चर्य की बात ये है कि दुर्योधन ने अपने सबसे बड़े शत्रु को यह चीज खुशी-खुशी दे भी दी.

जब दुर्योधन को बंदी बनायाकहानी महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले की है. पांडव वनवास के दौरान एक सरोवर के पास ठहरे हुए थे. उसी जंगल में दुर्योधन भी अपने कुछ सैनिकों के साथ आ पहुंचा. एक दिन वह सरोवर में स्नान करने गया. तभी स्वर्ग से कुछ गंधर्व वहां उतर आए और स्नान को लेकर दुर्योधन से विवाद हो गया. बात बढ़ी और युद्ध की नौबत आ गई. दुर्योधन गंधर्वों से हार गया और उसे बंदी बना लिया गया.

अर्जुन ने की दुर्योधन की मददजब पांडवों को पता चला कि गंधर्वों ने दुर्योधन को कैद कर लिया है, तो युधिष्ठिर ने अर्जुन को भेजा कि वह जाकर दुर्योधन को छुड़ाए. अर्जुन को लगा कि शत्रु होने के बावजूद किसी की मदद करना उसका कर्तव्य है. उसने गंधर्वों से युद्ध कर दुर्योधन को आज़ाद करा लिया. यह देख दुर्योधन हैरान रह गया और बहुत प्रभावित भी हुआ. उसने अर्जुन से कहा कि वह जो चाहे, मांग ले. अर्जुन ने विनम्रता से कहा कि वह समय आने पर वरदान मांगेगा.

पांच बाणों का रहस्यमहाभारत युद्ध के दौरान एक वक्त ऐसा आया जब दुर्योधन को लगा कि पितामह भीष्म पांडवों का पक्ष ले रहे हैं. गुस्से में आकर उसने पितामह भीष्म से कहा कि अगर वे चाहें तो पांडवों को एक ही दिन में मार सकते हैं. इस पर भीष्म ने पांच दिव्य बाण निकाले और कहा कि अगले दिन वह इनसे पांचों पांडवों का अंत कर देंगे. इन बाणों को देखकर श्रीकृष्ण समझ गए कि अब खतरा बढ़ चुका है. उन्होंने अर्जुन को याद दिलाया कि दुर्योधन एक बार वरदान दे चुका है. यही वह समय है जब उस वरदान का उपयोग किया जा सकता है.

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अर्जुन ने मांगा वरदानअर्जुन उसी रात दुर्योधन के शिविर में गया और वरदान की बात याद दिलाकर पांचों बाण मांग लिए. दुर्योधन को बात याद आ गई. उसने थोड़ी हैरानी के बाद भी क्षत्रिय धर्म निभाते हुए बाण अर्जुन को दे दिए. अगली सुबह दुर्योधन ने भीष्म से नए बाण तैयार करने को कहा, लेकिन भीष्म ने साफ इंकार कर दिया. उनका कहना था कि एक बार दिया गया वचन बदला नहीं जा सकता.

इसी वजह से कौरवों की हार की शुरुआत हुईइस तरह अर्जुन की बुद्धिमानी, श्रीकृष्ण की योजना और दुर्योधन के वचन पालन ने मिलकर पांडवों की जान बचा ली. इसी घटना को महाभारत के एक निर्णायक मोड़ के रूप में देखा जाता है, जहां से कौरवों की हार की शुरुआत हुई.

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