केले में रोग से बचाव के उपाय: गर्मी के मौसम में जहां तापमान का असर खेतों की मिट्टी और नमी पर साफ दिखता है, वहीं केले की फसल को लेकर किसानों की चिंता बढ़ती जा रही है. अप्रैल-मई की तपन के बीच फ्यूजेरियम विल्ट, जिसे आमतौर पर पनामा रोग कहा जाता है, केले की फसल में तेजी से फैल रहा है.
क्या है पनामा रोग? क्यों है ये केले की फसल के लिए घातक?पनामा रोग एक प्रकार की फंगल बीमारी है जो मृदा जनित (soil-borne) होती है. यह रोग केले के पौधे की संवाहिनी ऊतकों (vascular tissues) को नुकसान पहुंचाता है, जिससे पौधे में पानी और पोषक तत्वों का संचार बाधित हो जाता है. इसके नतीजे में पौधा धीरे-धीरे मुरझा जाता है और अंततः मर जाता है.
गर्मी में बढ़ता है असर, किसानों को नुकसान का डरगर्मी के मौसम में यह रोग अधिक सक्रिय हो जाता है और तेजी से खेत में फैलता है. किसान न केवल उत्पादन में गिरावट देख रहे हैं, बल्कि फसल की गुणवत्ता पर भी बुरा असर पड़ता है. राजनांदगांव जिले के कई किसान फसल में अचानक मुरझाने की शिकायत कर चुके हैं.
कृषि विशेषज्ञों की सलाह: समय रहते करें बचावडॉ. बीरेंद्र अनंत, सहायक संचालक, कृषि विभाग ने बताया कि पनामा रोग से बचाव के लिए किसानों को सतत निगरानी और जैविक रसायनों का प्रयोग करना चाहिए.
प्रभावी उपाय:ट्राइकोडर्मा एसपीपी (Trichoderma spp.): यह फंगस को नियंत्रित कर फसल की जड़ों की रक्षा करता है. इसे मिट्टी में मिलाकर उपयोग करना चाहिए.
बैसिलस एसपीपी (Bacillus spp.): यह बैक्टीरिया पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और पनामा रोग से प्रभावी रूप से बचाता है.
मृदा की नियमित जांच और संतुलित सिंचाई फसल को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करती है.
रसायनिक छिड़काव और जैविक उपचार का संतुलित उपयोग जरूरी है.
किसानों को क्या करना चाहिए?खेत की समय-समय पर जांच और निगरानी करें
रोगग्रस्त पौधों को अन्य पौधों से दूर हटाएं
ट्राइकोडर्मा और बैसिलस उत्पाद प्रमाणित स्रोत से लें
आवश्यकता अनुसार उद्यानिकी विभाग से संपर्क करें
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