How to control anger and how to deal with angry person reply by premanand maharaj।गुस्सा आए तो रुकिए, सोचिए: क्या आपकी प्रतिक्रिया आपको मजबूत बना रही है या कमज़ोर?, जानें प्रेमानंद जी महाराज से



Premanand Ji Maharaj: प्रेमानंद महाराज को कौन नहीं जानता? वे हर कठिन से कठिन सवाल का बड़ी ही सहजता से जवाब देते हैं. ऐसे ही उनके सत्संग में एक व्यक्ति ने अपने गुस्से से जुड़ा सवाल पूछा. उस व्यक्ति ने कहा हर इंसान के जीवन में ऐसे पल आते हैं जब गुस्सा उमड़ पड़ता है. कोई कुछ ऐसा कह देता है, जो बुरा लग जाता है, या कोई ऐसा बर्ताव करता है जो मन को ठेस पहुंचाता है. ऐसे वक्त में सबसे सामान्य प्रतिक्रिया होती है क्रोध, लेकिन क्या गुस्से का जवाब गुस्से से देना सही होता है? या फिर कोई और तरीका है जिससे हम खुद को संभाल सकते हैं?

महाराज का जवाबप्रेमानंद महाराज के अनुसार क्रोध कोई बाहरी ताक़त नहीं है, यह हमारे भीतर से पैदा होता है. सामने वाला कुछ कहता है या करता है, पर असल में हमारी प्रतिक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि हम उस क्षण क्या सोचते हैं. अगर हम सिर्फ इतना विचार कर लें कि “इस समय मेरा क्या कर्तव्य है?” तो हम उस भावनात्मक तूफ़ान में फंसने से बच सकते हैं.

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गुस्सा तब आता है जब हम किसी स्थिति से अपने अनुसार उम्मीद रखते हैं, और वह उम्मीद पूरी नहीं होती. हमें लगता है कि सामने वाला हमारी बात समझे, हमारा सम्मान करे, वैसा बर्ताव करे जैसा हम चाहते हैं, लेकिन जब ऐसा नहीं होता, तब भीतर झुंझलाहट पैदा होती है, और यही धीरे-धीरे गुस्से का रूप ले लेती है.

कैसे करें कंट्रोल?अब सवाल है कि इस गुस्से को रोका कैसे जाए? सबसे पहले तो यह समझना ज़रूरी है कि क्रोध पर जीत तभी पाई जा सकती है जब हम खुद को पल भर के लिए रोकें. उस एक क्षण में अगर हम सोच लें कि “यह प्रतिक्रिया देने से क्या हल निकलेगा?” तो शायद हम कुछ और बेहतर विकल्प चुन सकें.

एक और तरीका है खुद को उस समय टोकना. जब भी लगे कि गुस्सा आ रहा है, थोड़ी देर के लिए चुप रह जाना, गहरी सांस लेना और अपने विचारों को देखने की कोशिश करना यह एक छोटा-सा अभ्यास बड़ा असर दिखा सकता है. इससे हम खुद को बेहतर समझने लगते हैं और सामने वाले को भी सही तरीके से देख पाते हैं.

यह ज़रूरी नहीं कि हर परिस्थिति में हम सही हों. कई बार सामने वाला भी परेशान होता है, उसकी भी कोई वजह होती है, जिसकी वजह से उसका बर्ताव हमें अनुचित लगता है, अगर हम उसके दर्द को समझने की कोशिश करें, तो शायद हम नाराज़ होने की बजाय उसकी मदद करना चाहें.

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गुस्सा कमजोर बनाता है, जबकि धैर्य ताक़त देता है. जो व्यक्ति खुद को संभाल सकता है, वही सच्चे मायनों में मजबूत है. यह अभ्यास एक दिन में नहीं होता, लेकिन अगर हर बार जब गुस्सा आए, हम बस एक पल रुक जाएं, तो धीरे-धीरे बदलाव आना शुरू हो जाता है. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)



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