ज्येष्ठ अमावस्या के दिन शनि देव का जन्म हुआ था, इसलिए हर साल ज्येष्ठ अमावस्या पर शनि जयंती मनाई जाती है. इस साल शनि जयंती 27 मई मंगलवार को है. शनि देव के पिता सूर्य देव हैं और उनकी माता का नाम छाया यानि संवर्णा है. शनि देव का जन्म हुआ तो सूर्य देव उनके रंग और रूप को देखकर काफी चिंतित हो गए. उनको अपनी पत्नी छाया के चरित्र पर संदेह होने लगा. शनि देव जब बड़े हुए तो उनको यह बात पता चली तो उनको अपने पिता पर बहुत क्रोध आया. उस समय से शनि देव और सूर्य देव में 36 का आंकड़ा बन गया. पिता और पुत्र में शत्रुतआ का भाव पैदा हो गया. आइए जानते हैं शनि देव के जन्म की कथा के बारे में और उनकी माता के चरित्र पर क्यों सवाल उठा?
संज्ञा से हुआ सूर्य देव का विवाहप्रजापति दक्ष की बेटी संज्ञा से सूर्य देव का विवाह हुआ था. सूर्य देव का तेज इतना अधिक था कि वह संज्ञा से असहनीय हो जाता था. सूर्य देव और संज्ञा से तीन संतानों यमराज, वैवस्वत मनु और यमुना ने जन्म लिया. कुछ समय बाद संज्ञा ने अपने तपोबल से अपने ही रंग-रुप की संवर्णा नामक महिला को उत्पन्न किया, जिसे छाया के नाम से जानते हैं. संज्ञा अपने पिता दक्ष के घर चली गईं और सूर्य लोक में अपनी जगह पर छाया को छोड़ गईं, ताकि वे बच्चों का पालन-पोषण करें. लेकिन उनकी इस बात से पिता दक्ष नाराज हो गए, तो संज्ञा वन में जाकर तप करने लगीं. वह भी एक घोड़ी का रूप धारण करके, ताकि कोई पहचान न सके.
छाया से हुआ शनि देव का जन्मसूर्य देव को इस बात का आभास नहीं हुआ कि उनके साथ रहने वाली महिला संज्ञा नहीं छाया है. समय बीतने के साथ ही छाया और सूर्य देव से तीन संतानों शनि देव, भद्रा और मनु ने जन्म लिया. शनि देव का रंग काला था. सूर्य देव ने जब उनको देखा तो चिंतित हो गए.
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सूर्य देव को छाया के चरित्र पर हुआ संदेहसूर्य देव ने जब पहली बार शनि देव को देखा तो उनके रंग और रूप को देखकर दुखी हो गए. शनि देव के काले रंग को देखकर सूर्य देव ने छाया के चरित्र पर संदेह किया. सूर्य देव को लगा कि उनका पुत्र काला कैसे हो सकता है? इस सवाल के कारण छाया के चरित्र पर सवाल उठा.
इस वजह से शनि देव हुए कालेपौराणिक कथा के अनुसार, शनि देव की मां छाया जब गर्भवती थीं, तो उन्होंने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था. इसकी वजह से उनका भी शरीर काला पड़ गया था, उनके तप का प्रभाव गर्भ में पल रहे शिशु पर भी हुआ, इसकी वजह से शनि देव का रंग काला हो गया.
शनि और सूर्य में बना 36 का आंकड़ाशनि देव के जन्म के बाद जब छाया के चरित्र पर सवाल उठा तो शनि देव अपने पिता के प्रति शत्रुता का भाव रखने लगे. उनको अपनी माता का अपमान सहन नहीं था. उन्होंने शिव जी की तपस्या की, जिससे भोलेनाथ प्रसन्न हुए और शनि को न्याय के देवता की उपाधि प्रदान की. शिव कृपा से शनि को नवग्रहों में महत्वपूर्ण स्थान मिला.
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शिव कृपा से शक्तिशाली हुए शनि ने सूर्य देव को दंडित किया. माता छाया के अपमान का बदला लिया, उसके फलस्वरूप सूर्य देव को कुष्ठ रोग हो गया. तब उनको अपनी गलती का एहसास हुआ तो वो शिव जी की शरण में गए. शिव कृपा होने पर वे कुष्ठ रोग से मुक्त हुए और पहले जैसे हो गए. शनि देव ने अपने पिता सूर्य देव को दंडित करके मां छाया के अपमान का बदला तो ले लिया लेकिन पिता और पुत्र में रिश्ते खराब हो गए.
शिव कृपा से शनि देव बने दंडाधिकारीशिव जी के आशीर्वाद से शनि देव कर्मफलदाता बन गए. जो लोग जैसा कर्म करते हैं, उसके अनुसार ही शनि देव फल देते हैं. हर व्यक्ति के जीवन में एक बार शनि की दशा जरूर आती है, साढ़ेसाती और ढैय्या का प्रभाव पड़ता है, जिसमें शनि महाराज व्यक्ति को उचित व्यवहार करते हैं.